प्रकृति बचाओ आंदोलन के तहत चल रहे आमरण अनशन को 36 घंटे पूरे हो चुके हैं, लेकिन प्रशासन की नींद अब भी अधूरी है। खेजड़ी जैसे पवित्र और जीवनदायिनी वृक्ष को बचाने के लिए 29 भगवाधारी संतों के नेतृत्व में 80 महिलाओं सहित करीब 500 लोग अन्न-जल त्याग कर कलेक्ट्रेट परिसर में डटे हुए हैं। यह कोई सामान्य आंदोलन नहीं, बल्कि प्रकृति की अस्मिता और भविष्य की पीढ़ियों के अस्तित्व की लड़ाई है।अनशनकारियों ने पानी की एक बूंद तक गले से न उतारने का कठोर संकल्प लिया है। भूखे-प्यासे, लेकिन अडिग। शांत, लेकिन भीतर ज्वालामुखी। भजन-कीर्तन के बीच चल रहे इस आंदोलन में उस समय भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा, जब सभी अनशनकारी महाराजा गंगा सिंह जी की प्रतिमा के पास स्थित खेजड़ी के वृक्ष तक पहुंचे और सामूहिक पूजा-अर्चना कर प्रशासन के सामने अपना “यक्ष प्रश्न” दोहराया—बिना हिंसा के, लेकिन पूरी दृढ़ता के साथ, अपनी मांगें मनवाकर ही रहेंगे।
सुबह छह बजे संतों के सान्निध्य में खेजड़ी पूजन हुआ। प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए, लेकिन जब आंदोलन की शांति और अनुशासन सामने आया तो आला अधिकारी भी तारीफ किए बिना नहीं रह सके। सैकड़ों लोग मुंह पर उंगली रखे, मौन संकल्प में खड़े थे। यह दृश्य किसी आंदोलन का नहीं, बल्कि जनचेतना की जीवंत तस्वीर था।हालांकि इस तपस्या की कीमत अब शरीर वसूलने लगा है। किडनी पेशेंट अनशनकारी डाबला निवासी सुभाष की तबीयत बिगड़ गई। हालात की गंभीरता को देखते हुए जिला कलेक्टर ने एडीएम सिटी रमेश देव सहित अधिकारियों को पुनः वार्ता के लिए भेजा। विश्नोई धर्मशाला में अस्थायी अस्पताल बनाया गया, जहां 17 अनशनकारियों की जांच की गई। इनमें से चार को पीबीएम अस्पताल में भर्ती करना पड़ा, जिनमें संत लालदास महाराज और सरनव आश्रम सांचौर के संत रामेश्वर दास शामिल हैं।
स्वयंसेवकों ने बिना किसी शोर-शराबे के सेवा संभाली। चिकित्सा, व्यवस्था और अनुशासन—सब कुछ आंदोलनकारियों के स्तर पर ही दिखा, जो प्रशासन के लिए आईना है।
पूरे घटनाक्रम के दौरान आईएएस मयंक मनीष, आरएएस कुलराज मीणा, रणजीत बिजारणियां, कुणाल राहड़, उप निदेशक डॉ. देवेंद्र चौधरी, सीएमएचओ डॉ. पुखराज साध सहित दर्जनभर प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौजूद रहे। सुलह का रास्ता निकालने के प्रयास जारी हैं, लेकिन सवाल यही है,क्या सरकार खेजड़ी बचाने का कानून बनाएगी या इतिहास खुद को दोहराएगा?
राज्य भर से आए वक्ताओं के संबोधनों से माहौल बेहद उत्साहपूर्ण है। संत भागीरथ दास और समिति संयोजक परसाराम खोखर ने सरकार से स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पर्यावरण प्रेमियों की मांगें अब टाली नहीं जा सकतीं।
यह आंदोलन चेतावनी है—प्रकृति को नजरअंदाज किया गया तो जनता चुप नहीं बैठेगी। खेजड़ी बचेगी, तभी भविष्य बचेगा।






















