राजस्थान राज्य सूचना आयोग ने द्वितीय अपील संख्या RIC/BIKN/A/2026/001296 में एक महत्वपूर्ण कार्रवाई करते हुए बीकानेर के राज्य लोक सूचना अधिकारी एवं मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20(1) के अंतर्गत कारण बताओ नोटिस जारी किया है। आयोग ने प्रथम दृष्टया माना कि मांगी गई सूचना अधिनियम द्वारा निर्धारित समय-सीमा में उपलब्ध नहीं कराई गई तथा इसके लिए कोई संतोषजनक और विधिसंगत कारण प्रस्तुत नहीं किया गया। मामले की अगली सुनवाई 13 मार्च 2026 को प्रातः 11:00 बजे कोर्ट नंबर 4 में निर्धारित की गई है, जिसमें संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना होगा।
यह विवाद 24 जुलाई 2025 को दायर एक आरटीआई आवेदन से प्रारंभ हुआ, जिसमें अपीलकर्ता डॉ. मंजु गुप्ता कछावा ने पूर्व में प्रस्तुत न्यायिक शिकायतों पर हुई प्रशासनिक एवं न्यायिक कार्यवाही से संबंधित अभिलेखों का निरीक्षण तथा प्रमाणित प्रतिलिपियाँ मांगी थीं। 30 जुलाई 2025 को लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदन को विषय-वस्तु पर विचार किए बिना मात्र तकनीकी आधार पर Form-D के माध्यम से अस्वीकार कर दिया गया। इस अस्वीकृति के लिए राजस्थान सूचना अधिकार (उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालय) नियम, 2006 तथा विशेष रूप से नियम 10(2) का हवाला दिया गया।
अपीलकर्ता का आरोप है कि अधीनस्थ नियमों की आड़ लेकर संसद द्वारा पारित सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2(j) में निहित अभिलेख निरीक्षण के अधिकार तथा धारा 6(1) के अंतर्गत सरल आवेदन प्रक्रिया को बाधित किया गया। उन्होंने विशेष रूप से धारा 22 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान अधिनियम को अन्य किसी भी कानून, नियम या उपनियम पर वरीयता प्रदान करता है, इसलिए अधीनस्थ नियमों के आधार पर सूचना से इनकार किया जाना विधिक दृष्टि से अल्ट्रा वायर्स है। प्रथम अपील दायर किए जाने के बावजूद सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई और धारा 7(8) के अनुरूप कारणयुक्त आदेश भी पारित नहीं किया गया। बाद में 4 सितंबर 2025 को पुनः प्रस्तुत आवेदन को “प्रशासनिक गोपनीय विशेषाधिकार” जैसे अधिनियम-बाह्य आधार पर अस्वीकार कर दिया गया, जबकि धारा 8 या 9 का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया।
दिनांक 16 फरवरी 2026 को आयोग के समक्ष हुई सुनवाई में डॉ. मंजु गुप्ता कछावा व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुईं और विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने आयोग के समक्ष कहा कि सूचना निर्धारित समय-सीमा में उपलब्ध नहीं कराई गई, अधिनियम की धारा 22 की अनदेखी की गई और अधीनस्थ नियमों को केंद्रीय अधिनियम से ऊपर रखने का प्रयास किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि पारित अस्वीकृति आदेश विधिक परीक्षण में टिकने योग्य नहीं हैं। आयोग ने अभिलेखों का अवलोकन करने के पश्चात धारा 20(1) के अंतर्गत कारण बताओ नोटिस जारी किया।
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20(1) के अनुसार सूचना देने में अनावश्यक विलंब या अनुचित अस्वीकृति की स्थिति में संबंधित अधिकारी पर 250 रुपये प्रतिदिन की दर से अधिकतम 25,000 रुपये तक का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया जा सकता है, जो उसके वेतन से वसूल किया जाता है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रावधान प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक सशक्त साधन है और यह सिद्धांत स्थापित करता है कि कोई भी पद कानून से ऊपर नहीं है।
यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह कार्यवाही किसी न्यायिक आदेश के विरुद्ध नहीं है, बल्कि लोक सूचना अधिकारी के रूप में निभाए जाने वाले प्रशासनिक दायित्व से संबंधित है। जब कोई न्यायिक अधिकारी लोक सूचना अधिकारी की भूमिका निभाता है, तब वह अधिनियम के प्रति उसी प्रकार जवाबदेह होता है जैसे अन्य कोई सार्वजनिक प्राधिकारी।
डॉ. मंजु गुप्ता कछावा ने कहा कि सूचना का अधिकार लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला है और यदि अधीनस्थ नियमों की आड़ लेकर नागरिक के अधिकार को रोका जाएगा तो जवाबदेही तय होगी, चाहे पद कितना भी ऊँचा क्यों न हो। उन्होंने इसे केवल एक आरटीआई विवाद नहीं, बल्कि पारदर्शिता, विधि-शासन और प्रशासनिक उत्तरदायित्व की कसौटी बताया।























