राजस्थान प्रदेश के प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक हक है राजस्थानी भाषा की मान्यता, केंद्र सरकार दस करोड़ लोगों की जनभावनाओं का अनादर कर रही है,तुरन्त ही मान्यता के प्रस्ताव को पास कर राजस्थान की संस्कृति, रोजगार को बचाना चाइये ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी भाषा को समझ सके तथा अपने अस्तित्व का संरक्षण कर सके।
इसके साथ ही राजस्थान प्रदेस शूरवीरों की धरा रही है और इस धरा के लोग शांतिपूर्वक तरीके से पिछले अस्सी सालों से आंदोलन कर रहे है सरकारों को इनके धैर्य की परीक्षा नही लेनी चाइये यह विचार रखते हुए पूर्व सिंचाई मंत्री देवीसिंह भाटी ने राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए पिछले तीस वर्षों से बीकानेर कचहरी परिसर में धरना आयोजित कर रही राजस्थानी मोट्यार परिसद द्वारा रखे गए धरने में अपनी उपस्थिति दी तथा कहा कि हम भाषा आंदोलन में लोगो के साथ है।
कांग्रेस सरकार में राजस्थान में केबिनेट मंत्री रहे डॉ बी डी कल्ला ने कहा कि राजस्थानी भाषा का इतिहास बहुत पुराना है, इतनी समृद्ध भाषा की मान्यता के लिए लोगो को आंदोलन करना पड़ रहा है इससे शर्म की बात राजस्थान की जनता के लिए क्या होगी, राजस्थान सरकार ने 2003 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर दिया था अब तो केंद्र सरकार को इस प्रस्ताव की सुध लेनी चाइये ओर दस करोड़ लोगों की मातृभाषा को उनका हक देना चाइये।
भाषाई मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष को एक होकर अपने हकों की रक्षा करनी चाइये,
उदयपुर से पधारे राजस्थानी मोट्यार परिसद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ शिवदान सिंह जोलावास ने कहा कि राजस्थानी भाषा की मान्यता से लाखों रोजगार पैदा होंगे, हर विभाग में राजस्थानी भाषा के विद्यार्थीयो को रोजगार मिलेगा, राजस्थान प्रदेश में बाहरी प्रदेशो से आकर नोकरी लगने वाले लोगो का प्रवेश बंद हो जाएगा और समस्त नोकरियो पर राजस्थानी विद्यार्थियों को ही लिया जाएगा।
प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ गौरी शंकर प्रजापत ने कहा कि भाषा वैज्ञानिकों ने एक भाषा के निर्धारित मापदंड तय किये है उन मापदंडों पर राजस्थानी भाषा खरी उतरती है फिर भी सरकारों ने इसे फुटबाल बना रखा है।
धरने को सम्बोधित करते हुए बीकानेर सम्भाग अध्यक्ष डॉ हरिराम बिश्नोई ने बताया कि किसी भी प्रदेश का अस्तित्व, पहचान उसकी मातृभाषा पर आधारित होता है, राजस्थानी भाषा को मान्यता तथा राजभाषा नही होने से प्रत्येक नागरिक को उसके अस्तित्व संरक्षण के लिए ही झूझना पड़ रहा है, प्रत्येक राजनेता को अपनी मातृभाषा के हक में बोलकर अपनी मातृभाषा का कर्ज अदा करना चाइये।
धरने को सम्बोधित करते हुए साहित्यकार राजेन्द्र जोशी ने बताया कि अगर राजस्थानी भाषा को मान्यता नही मिली तो आने वाले कुछ ही वर्षो में इसके अस्तित्व पर संकट पैदा हो जाएंगे।
केंद्रीय साहित्य अकादमी से पुरुस्कृत शंकर सिंह राजपुरोहित ने धरने को जोश भरते हुए कविता के माध्यम से केंद्र सरकार और राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहा।
छात्र नेता कृष्ण कुमार गोदारा ने कहा कि युवाओं के धैर्य की परीक्षा लेनी बंद करे सरकारें, क्योंकि जब जब युवा ठान लेता है तो सरकारों को ही बदलना पड़ता है,
एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष हरिराम गोदारा ने बताया कि जो नेता जनता से चुनकर जाते है और विधान सभा ओर संसद में उनको उनकी मातृभाषा में ही नही बोलने दिया जाता इससे बड़े दुर्भाग्य की बात क्या होगी।
राजस्थानी मोट्यार परिषद बीकानेर के जिलाध्यक्ष हिमांशु टाक ने कहा कि अब राजस्थान का युवा जाग चुका है और अपने हकों के लिए लड़ना भी जानता है।हम हमारा हक मांगते है इसमे सरकार क्यो आनाकानी कर रही है समझ से बाहर है।
धरने को डॉ नमामि शंकर,राजेश चौधरी, गोपाल जोशी,रामावतार उपाध्याय विनोद सारस्वत, सरला बिश्नोई, राजाराम स्वर्णकार, एडवोकेट जयदेव आचार्य, पूर्व कोच रमेश पुनिया,रामकिशन डेलू,राकेश डोगीवाल 7011, कमल किशोर मारू,मोइनुदीन,बजरंग सहारण,राजेन्द्र चौधरी आदि ने संबोधित किया।
धरने में उदयपुर, नागौर, बाड़मेर,सीकर,गंगानगर,हनुमानगढ़, जयपुर आदि से भाषा समर्थक पधारे।
धरने को सफल बनाने में भरत दान, विनोद माली ब्रह्माकुमार गहलोत, पप्पू सिंह, भगवाना राम,शुभकरण उपाध्याय,नख्तू चंद ,मुकेश परिहार,लक्ष्मण उपाध्याय,, करण चौधरी छात्र नेता,अजय जोशी राजूनाथ,कृष्णकांत,सुनील बिश्नोई,अर्जुन पारीक,पृथ्वीराज, नकतू सिंहका सहयोग रहा।
मंच संचालन मदन दासोड़ी ने किया तथा आये हुए धरनार्थियों का आभार प्रकट दिलीप सेन तथा बजरंग बिश्नोई ने किया।























